बात की शुरुआत करने से पहले हमें श्रीगणेश या विस्मिल्लाह कर लेना चाहिए, एेसा मेरे पिताजी बोलते थे। बात की शुरुआत बड़े दिनों बाद करने का मौका मिला, इस के लिए ओह गॉड कहना भी जरुरी है। ब्लाग आ सैकड़ों की तादात में हो गए हैं। जब मैंने शुरु किया था तब अंगुलियों में ही थे। आज तकनीक ने इतना अच्छा रुप ले लिया कि बस यही शब्द याद आते हैं
ये आने वाले वक्त बता तेरी कजा क्या है
जब तुम नहीं थे तब हम थे तो फिर ए सजा क्या है
ये आने वाले वक्त बता तेरी कजा क्या है
ये पक्तियां किसी की नहीं ठलुवागिरी करने वाले मेरे अज्ञानी मन से उस स्थान पर से उठी हैं जहां ठलुवा को जन्म देने वाली मां का निवास है सुदूर उत्तराखंड के तराई वाले इलाके में-- कहानी कुछ यूं है एक गरीब किसान और भूतपूर्व सैनिक के परिवार में पैदा हुआ ठलुवा और फिर उसने किसी तहर दूसरों के रहमो करम पर अपनी जिंदगी शुरू की, जिंदगी मत कहिए उसे वो जिंदगी का फल सफा है, जिसके जरिए जिंदगी जीने का मकसद सीख लेता है आदमी, एक प्रकार का प्रशिक्षण। साथियों यह बतादें कि जब किसी दूसरे के सहारे आप विद्या का अर्चन करने जाते हैं तो समझ लिजिए तब क्या होता था। आज तो हर शहर में बच्चों के लिए छात्रावास हैं खाने पीने के तमाम बंदोबस्त हैं, आज से बीस-पच्चीस वर्ष पहले जब ठलुवा पढ़ाई करने गया होता तो उसने किन कठिनाईयों का सामना किया होगा इसे आज की कठिनाई से तोलना बड़ा कठिन है। उस वक्त की बात कर रहे हैं जब ठलुआ मात्र कक्षा छह में पढ़ता था, उम्र करीब रही होगी यही कोई 1१ वर्ष के आस-पास। उत्तराखंड के प्रवेश द्वारों में से एक है नेपालसीमा पर स्थित टनकपुर, रेल पहुंचने का भी एक मात्र स्थान है। वहां से शुरू हुई ठलुवा की यात्रा- आज बस इतना ही।
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