ठलुवागिरी का मतलब क्या है? ठलुवा एक आम आदमी है, जो दिनभर दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करता है और फिर शाम को चिड़िया की तरह अपने घोंसले नुमा घर में कैद हो जाता है। वहां उसे ना राजनीति से कोई लेना होता है ना नेताओं से सरोकार। लेकिन वो सबकुछ समझता है, नेता और नौकरशाहों के साथ मिलकर पूंजीपति समाज में कौनसी गोटी फिटकर उल्लू सीधा कर रहे हैं। वही से वह ठलुवा की तरह सोचने लगता है।
Saturday, 10 July 2010
ठलुआ की कहानी समय की जुवानी-भाग चार
टनकपुर से पूर्णागिरी पर्वत पर विराजमान मां पूर्णागिरी की कथा के बाद फिर हम इसी पर्वत की जड़ पर चुका नामक स्थान के पास पहुंचते हैं, जहां अंग्रेजों ने रेल पहुचाई थी, बताते हैं कि वहां रेल की पटरी तो गई, लेकिन रेल ब्रह्मदेव से आगे नहीं बढ़ पाई। चूका के पास ही है रणजीति माता का मंदिर, रणजीति मांता के बारे में किंवदंति है कि पांडवों ने महाभारत का रण यानी युद्ध जीतने के लिए शक्ति के इस रूप की अराधना की थी। कुछ लोग कहते हैं कि नेपाल के शक्ति उपासकों ने रणजीति माता की यहां एकांत वन क्षेत्र में तंत्र साधना के लिए स्थापना की थी। बहरहाल, रणजीति मांता के उपासकों की भी नेपाल और भारत में कमी नहीं है, हजारों लोग यहां मंदिर में दर्शन करने आते हैं और अपनी मन्नत पूरी होने पर मांता के चरणों में सिर झुकाते हैं, यहां बलि प्रथा का चलन है। अष्ट बलि यानी आठ बकरियों की एक साथ बलि का यहां प्रचलन है। ढोल, दमाऊ और नगाड़ों के साथ निशान लेकर लोग मंदिर में बलि चढ़ाने आते हैं, इस मंदिर के आसपास घनघोर वन क्षेत्र हैं, जहां जंगली जानवरों के दर्शन भी बड़ी आसानी से हो जाते हैं, मोर, गुलदार, हीरण, खरगोश के अलावा यदाकदा गजराज भी यहां नजर आ जाते हैं। चूका गांव के बाद काली कुमाऊं के सबसे खतरनाक माने जाने वाले मंच और तामली घाटियों का इलाका शुरू होता है। तामली चूका से ठीक उपर है जबकि मंच कुछ हटकर बाइ्र्र ओर को है। तामली के बारे में कहा जाता है कि यहां पहले तांबे की खाने थी, कुर्मांचल और डोटी नेपाल के इलाकों में ताम्र धातु का उत्पादन इसी तामली में मौजूद तांबे की खानों से होता था। वर्तमान में तांबे की खानों के अवशेष कई स्थानों पर गुफाओं के रुप में मिलते हैं, अलबत्ता वन क्षेत्र और दुर्गम होने के कारण इन खानों के अवशेषों की ओर अभी किसी का ध्यान नहीं गया है। तामली के बाद मंच आता है। मंच का अर्थ होता है सिंहासन यानी गद्दी। मंच में बाबा गुरु गोरखनाथ की धूनी प्रसिद्ध है। बाबा गोरखनाथ का आश्रम और वहां कई वर्षों से प्रज्ज्वलित धूनी आस्था का केंद्र है। इसके पीछे भी कथा है। कहते हैं टनकपुर से पहले ही नानकमत्ता है, जहां नानकदेव जी स्वयं पधारे थे। पहले उस स्थान को गोरखमत्ता कहते थे, वहां गुरु गोरखनाथ का अखाड़ा था। लेकिन, महातपी गुरु गोरखनाथ के शिष्यों में अपनी सिद्धियों के प्रति इतना अहंकार था, उन्होंने अपने अहंकार के कारण गुरुनानक देवजी का काफी अपमान किया, इससे खिन्न गुरु नानकदेवजी ने शिष्यों को सबक सिखाने के लिए उन्हें गोरखमत्ता से भागने पर मजबूर कर दिया और उनके पीछे-पीछे रीठा साहिब तक पहुंच गए। शिष्य वहां से नेपाल की ओर भाग गए, नानकदेव जब वापस लौटे तो फिर गुरु गोरखनाथ के शिष्यों ने अपना अखाड़ा मंच में लगाया, जो अभी भी वहां विद्यमान है। मंच और तामली के बाद फिर तल्ला देस का इलाका शुरू होता है। तल्लादेस चंद राजाओं के समय में चंपावत राज्य के नीचे का इलका था इसी लिए इसे तल्लादेस कहते थे। तल्लादेस में खेती बाड़ी के लिहाज से काफी कुछ पैदा होता है, लेकिन मोटरमार्ग नहीं होने से यह इलाका काफी पिछड़ा हुआ है। कई पट्टियों में फैले तल्लादेश का इलका चल्थी से लगता हुआ, सूखीढांग और इधर चंपावत के कांतेश्वर महादेव मंदिर पर्वत शिखरतक फैला हुआ है। यह इलका काफी प्राकृतिक रूप से समृद्ध है। जारी......
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1 comment:
bahut sahi bagauli ji.....
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