Monday, 28 June 2010

ठलुआ की कहानी समय की जुवानी-भाग तीन



भटकने से पहले बता दें कि हम ठलुआ की कहानी कह रहे हैं इस कहानी को हमने शुरू किया था टनकपुर से, अब हमारा अगला पड़ाव है गैंड़ाखाली गांव से आगे का चौथा रोखड़ फिर आया चिलियाघोल गांव, पूरी आवादी अमीर दलितों की, चंद घरों को छोड़ सभी अच्छे खासे खाते पीते पहाड़ी दलित परिवार। यहां से शुरू हुआ पूर्णागिरी पर्वत शिखर का मुहाना, सड़क यहां से ऊंचाई लेनी शुरू कर देती है, एक तरफ टनकपुर वन प्रभाग का सागवान के पेड़ों से भरा हुआ जंगल और दूसरी तरफ गांव, यहां सड़क पर चलते हुए हम शारदा नदी के विहंगम नजारों के साथ ही उसके पार नेपाल में सिद्धनाथ पर्वत की हरीभरी वृक्षमालाओं का भी आनंद ले सकते हैं, इसके बाद फिर ऊंचौली गोठ गांव पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले यादवों (अहिरों) काली कुंमाऊ की भाषा में एेर भी कह सकते हैं का गांव, यह गांव पूरी तरह पथरीला है, यहां सिर्फ खाने पीने भर के लिए ही अन्न उगता है। लोगों का मुख्य व्यापार पशुपालन और दूध ही है। अधिकांश लोग भैंसे पालते थे उस वक्त, अब पशुओं की संख्या घटती जा रही है। उसकी वहज है अब युवा नये-नये रोजगार के साधनों को अपना रहे हैं तो यह क्षेत्र अछूता कैसे रहे। इस गांव के बीच भी कई छोटे बड़े रोखड़ हैं, लेकिन काफी छोटे-छोटे। गांव खत्म होते-होते ही कई आश्रम भी अब बन गए हैंं। इन आश्रमों के खत्म होते ही ब्रह्मदेव पवित्र तीर्थ जहां पांडवों ने अज्ञातवास खत्मकर विजयश्री यज्ञ किया था। बुजुर्ग बताते थे कि जब अंग्रेजों ने ब्रह्मदेव तक रेलवे लाइन पहुंचाई थी तो ब्रह्मदेव के पास तांबे का एक विशाल हवन कुंड निकला था, लेकिन उस कुंड को निकाल कर ले जाने के लिए अंग्रेजों के सभी जतन फेल हो गए तो उन्होंने इस कुंड को वैसा ही दबा दिया। लोग इतना तक कहते हैं कि उसके बाद अंग्रेजों की बागेश्वर तक रेल लाइन ले जाने की योजना को भी इसके बाद पलीता लग गया। वायदवे यह ताम्र कुंडवाली घटना नहीं हुई होती तो सायद बागेश्वर के बागनाथ तक रेल पहुंच भी गई होती। आजादी के 60 वर्ष बीतने के बाद आज तक यह रेल मार्ग मात्र सर्वे तक ही सीमित है। जबकि अंग्रेजों ने तब ब्रह्मदेव से बीस किमी आगे चूका तक रेल लाइन विछा दी थी। यह अलग बात है कि वहां रेल कभी नहीं पहुंची। क्यों कि उसके बाद अंग्रेजों के पांव भारत से उखडऩे लगे। इसके ब्रह्मदेव से एक रास्ता, चूका होते हुए मंच और तामली के लिए चला जाता है जो सीधे चम्पावत, लोहाघाट (काली कुंमाऊ) और पंचेश्वर की ओर जाता है और दूसरा मार्ग आदि शक्ति पूर्णागिरी मंदिर की ओर जाता है। पूर्णागिरी तीर्थ के बारे में कथा का जिक्र भी यहां तर्क संगत लगती है। कथा है कि जब भगवान शंकर के लाख मना करने के बाद भी सती माता जब अपने पिता हिमालय राज दक्ष प्रजापति के यज्ञ में शामिल होने के चली गई, वहां जाकर सती माता ने देखा कि उनके आने के बाद भी किसी ने उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया और उन्हें अपने बीच आया देख उनके पिता दक्ष ने शिव की आलोचना की और सभी देवतागण शिव आलोचना पर ठहाके लगा कर हंसने लगे। कहते हैं कि इससे सती को भारी ग्लानि हुई और अपने आने का पछतावा भी, पति आज्ञा बिना पिता के घर आने के बाद उनका इसतरह लौटना भी उचित नहीं था तो उन्होंने दख प्रजापति के यज्ञ के कुंड में ही सशरीर प्रवेश कर यज्ञ को ही विध्वंस कर लिया। सती के आत्मदाह करने की सूचना पर ही सभा में मौजूद सभी प्रमुख देवता गण पलायनकर चले गए। यह खबर भगवान शंकर के कानों तक भी गई, पत्नी प्रेम से विचलित शंकर ने अपनी जटाओं को खोलकर रुद्र अवतरित किया और उसे दक्ष यक्ष विध्वंस करने का आदेश दिया। आदेश मिलते ही रुद्र ने अपना काम किया और यज्ञ का विध्वंस कर दक्ष का सिर भी धड़ से अलग कर दिया। रुद्र के तांडव के बाद हताशा शिव जी वहां पहुंचे और और उन्होंने सती का शव अपने कंधे पर उठाकर विलाप करना शुरू किया, कथा है कि विलाप करते हुए शिवजी इस कदर विक्षिप्तहुए कि वे शव को कंधे पर धरे धरे तीनों लोक चौदह भुवन घूमने लगे। कहा जाता है कि जब लम्बा समय बीत गया तो देवताओं ने विष्णु भगवान की अनुनय विनयकर किसी तरह शिवजी के कंधे से सती का शव हटाने का अनुरोध किया, शव को विष्णुभगवान भी सीधे नहीं हटा सकते थे सो उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से धीरे-धीरे शव को काटना शुरू किया, कहा जाता है कि सुदर्शन चक्र से कट कर जो-जो अंग सती जी का जिस स्थान पर गिरा वही शक्तिपीठ की स्थापना हुई, बताते हैं कि पूरे विश्व में 108 स्थानों पर यह शव के हिस्से गिरे। उन्हीं में से एक सती की नाभि का हिस्सा पूर्णागिरी पर्वत पर गिरा, यही नाभिस्थल पर सती का पूरा शरीर शिवजी के कांधे से गिर गया। तो उनकी तंद्रा भंग हुई और वे सामने के सिद्ध पर्वत पर गिर पड़े। तभी से इस स्थल पर शक्ति और शिव की अराधना होती है। प्रतिवर्ष लाखों लोग मां के दर्शन के लिए यहां आते हैं।

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