Monday, 28 June 2010

आमदनी अट्ठन्नी खर्चा रुपय्या

ठलुआगिरी किसी को ना करती पड़े दोस्तो,
एक मजदूर, रिक्शेवाले और गरीब आदमी का नाम है, पता है आपको। इस मजदूर की आमदनी महज, 60 से 70 रुपये तक है और खर्चा ना बाबा ना, नून तेल का भाव तो आप जानते ही हैं, अगर इन 60 रुपयों का बजट बनाकर भी ठलुआ चलता है तो कैसे बजट बनाएगा। इससे पहले ठलुआ की परिवारिक पृष्ठभूमि भी तो जान लो, मिया-बीबी, कमसे कम पांच बच्चों से कम हो ही नहीं सकते,चार भी रखलो तो मजदूरी काफी कम है।
बजट
भोजन की व्यवस्था तीन वक्त नहीं हो सकती मात्र एक वक्त ही हो सकती है। बजट बनाते हुए मुझे किसी महान कवि की एक पक्ति याद आ रही है, पत्थर उबालकर मां ने खाना बनाया
बच्चों को उसका रस पिलाया
फिर ठंड़ा पानी पिलाया
उन्हें अपने फटी हुई साड़ी से ओढ़ा कर सुलाया
बच्चों को आई मां के संग गहरी नींद...
जो सायद कभी ना खुलेगी।
इसी तरह का बजट है गरीब का, उपर से सरकार ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस महंगी कर दी, इस महंगाई में फिर कैसे बनाए गरीब अपना बजट, आटे के रेट हैं 14 से 16 तक, चावल ना बाबा ना सबसे सस्ता भी 17 से कम नहीं है, सरसों का तेल तो 50 से उपर है ही, चीनी मासा अल्ला कभी 34 से नीचे नहीं उतरती, गोया आलू जरूर सस्ता बिक रहा है वह भी मीठा वाला 5 रुपये किलों को, आलू से ही पेट भरले क्या गरीब, नहीं बनता भाई, खाना ठलुवा की वीबी ने तो यहां तक कह दिया, अगर नहीं कमा के ला सकते तो फिर मर्द किस बात के हो, क्या चोरी करू भागवान, किसी के घर डांका डालू, डाल भी लू, गोया पुलिस पकड़ ले गई तो फिर जो नमक रोटी मिल रही है बच्चों को वो भी नसीब नहीं होगी, बेरहम मत बनों मेरी जाने जां, नमक रोटी से ही गुजारा करो, आलू का नमकीन पानी के साथ रोटीखाने में ही मौजा कर लो, गरीबों की छोड़ दो यार,
एक मध्यवर्गीय परिवार की देख लो, बच्चों की पढ़ाई का आलम यह हो गया कि ना बाबा ना, बड़ी बेटी एसबीबीएस कर रही है, एक प्राइवेट कॉलेज से दस लाख से अधिक का खर्चा तो उसका है, बेटा इंजीनियङ्क्षरग में निकल गया है, उसके लिए कहां से लाएं मोटी फीस उपर से अपनी बीमारी, पत्नी के अपने खर्चे, अब तो बिचारी ने एक साल में तीन चार बार ही ब्यूटी पार्लर देखा होगा। कहां से करें पूरा यार, टेंसन, टेंशन, टेंषन, क्या करें यार, इससे अधिक अमीर आदमी के घर में हम झांक नहीं सकते, गोया उनको भी कुछ ना कुछ तो परेशानी हो ही रही होगी, उनके भी उत्पादों पर फर्क तो पड़ा ही होगा। लेकिन यार गरीब का क्या करें- क्या कहे।
दिल पे रख के हाथ कहिए देश क्या आजाद है.....
इस आजादी का क्या मायना यार, जहां रोटी कपड़ा और मकान की व्यवस्था ही ना हो सके।
जिस देश में किसान को उसकी फसल का वाजिम दाम, मजदूर को उसकी मजदूरी का पूरा हक, एक नौजवान के हाथों को काम न मिले उस आजादी का क्या करें भाई। ठलुवागिरी करने के बाद भूख तो लगती है ना, कास कि भूख नहीं लगती और आदमी बिना खाना खाए जी लेता तो फिर क्या कहने..
और हर कोई कहता..... जोर..
जोर से कहता ओ.....भाई.....
....आमदनी अट्ठन्नी और खर्चा चवन्नी!!!!!.?

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