ठलुवागिरी का मतलब क्या है? ठलुवा एक आम आदमी है, जो दिनभर दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करता है और फिर शाम को चिड़िया की तरह अपने घोंसले नुमा घर में कैद हो जाता है। वहां उसे ना राजनीति से कोई लेना होता है ना नेताओं से सरोकार। लेकिन वो सबकुछ समझता है, नेता और नौकरशाहों के साथ मिलकर पूंजीपति समाज में कौनसी गोटी फिटकर उल्लू सीधा कर रहे हैं। वही से वह ठलुवा की तरह सोचने लगता है।
Friday, 9 July 2010
आजादी बोले तो, वो जो है ही नहीं !
कितना अच्छा लगता है, जब कभी आदमी आजाद हो जाता है। आजादी बोले तो जिसके बंधन नहीं हो, बंधन बोले तो, जो खूंटे से बंधा हुआ न हो, खूंटा बोले तो, जिसका एक दायरा ना हो। हां भाई एक बात याद आई खूंटे और बंधन से अमृता प्रीतम की एक कहानी में पढ़ा था कि एक रेगिस्तान में ऊंटों का काफिला जा रहा था, उस काफिले में शामिल एक ऊंट वाला अपने साथ ऊंट को बंधने के लिए रस्सी लाना भूल गया था। अब क्या करे, काफिला चलते चलते काफी दूर निकल गया। अब रात हो गई, रात बोले तो सोने और आराम करने का वक्त, लेकिन जिस सराय में काफिला आराम करने पहुंचा वहां देखा कि सराय वाले के पास भी रस्सी का इंतजाम नहीं था, अब क्या हो सारे काफिले के लोग एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। समस्या का पता सराय के मालिक को भी लगा। सराय के मालिक ने ऊंट वाले से कहा, एक खूंटा गाड़ों जो है ही नहीं, एक रस्सी ऊंट के गले में बांधों जो है ही नहीं, ऊंट का मालिक बोला, एे क्या हुआ, सराय का मालिक बोला करो तो जो हैं ही नहीं। ऊंट के मालिक ने वोही किया, एक खूंटा गाड़ा जो था ही नहीं, ऊंट के गले के चारों ओर हाथ फेर कर एक रस्सी लगाई जो थी ही नहीं, फिर ऊंट को उस रस्सी से बांध दिया जो थी ही नहीं। इस तरह ऊंट उस रस्सी बंध कर आराम से सो गया। सुबह हुई और तमाम काफिले के लोग तैयार हो कर अपने अगले पड़ाव के लिए जाने लगे। जिस ऊंट को बिना रस्सी और खूंटे बांधा गया था उसके अलावा सभी ऊंट खड़े हो गए और तैयार हो गये, लेकिन वह ऊंट खड़ा नहीं हुआ। इस पर तमाम जतन किए गए, कोई सफलता हाथ नहीं लगी, ऊंट था कि उठने का नाम ही नहीं ले रहा था। इतना सब हाने के बाद बात फिर सराय के मालिक के पास पहुंची, वह मौके पर आया और उसने यादि दिलाई कि पहले खूूंटा उखाड़ों जो हैं ही नहीं, सबने घन चलाकर खूंटा उखाड़ा जो था ही नहीं, खूंटा उखड़ते ही ऊंट खड़ा हो गया। उसके गले के चारों ओर की रस्सी खोली गई जो थी ही नहीं। इस प्रकार काफिला आगे बड़ा, और फिर जब भी उस काफिले के ऊंटों की रस्सी टूटती या खो जाती तो वे इस नुस्के को अजमाते और आगे बढ़ते। इस कहानी को कहने का मतलब अमृता जी की कहानी को याद दिलाना नहीं बल्कि इससे सीख लेना है। आदमी बुद्धीमानी और पशु की अज्ञातना का तुलनात्मक अध्ययन करना है। बोले तो आजादी का मतलब ऊंट से पूछो या खुद ही जान लो ना यार, ठलुओं की जमात में काहे खड़े रहते हो बोले तो........!!!!!!!!!!!
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