Wednesday, 30 June 2010

गुरु! नई पीढ़ी को नहीं मिलेगा मां का आंचल

मां के आंचल के तले, दुनिया के सारे गम भी टले... लेकिन भाई हमको-तुमको तो मां का आंचल मिल गया, लेकिन क्या हमारे बाद की पीढ़ी को मां का आंचल मिल भी पाएगा। क्यों बे ठलुवे एेसी बात करता है ना जिसका कोई मतलब नहीं होता, उस्ताज बात पूरी सुने बिना अपनी बे टिकट जीभ को चला देते हो गोया बात तो पूरी होने दो, तर्क तो सुनों...चुप बे चुप। नहीं चुपता... जिद मत कर कान के नीचे बजेगी। गुरु सुन तो लो, सुना। गुरु अब पीढ़ी इतनी एडवांस हो गई कि आंचल वाली साड़ी तो पहनती ही नहीं यार, सभी मां केवल जींस पहनती हैं, जींस में आंचल तो होता नहीं। अरे बाप रे..... ठलुआभाई बात तो तेरी सौ आने सच है। गुरु सौ तो समझ में आया ये आना क्या है। अबे आना नहीं जानता, नहीं जानता... कुछ व्याकरण सहित समझाओ, अबे समझ चवन्नी, अट्ठन्नी तो सुनीं है ना। हां चवन्नी को कहते है चार आना, अट्ठन्नी आठ आना, इसी को आना कहते हैं, समझ में नहीं आया गुरु। नासमझ, समझ कि 25 पैसे में चार आने हुए तो एक आने में हुए 1१.२५ पैसे।1१.२५ पैसे का हुआ एक आना, लेकिन गुरु .25 पैसे तो मैने देखे ही नहीं। चुप-जा अपनी काली जवान मत खोलना अब इससे ज्यादा मैं तुझे समझा भी नहीं सकता। अच्छा गुरु कोशिश करता हूं कि समझ में आ जाए। चुप हो जा मेरे लाल जल्दी ही तेरे सभी आने-पाई का कर्जा चुका दुंगा और तूझे दफा करूगा। गुरु आने तो ठीक पाई क्या हैं। मुझें नहीं पता मेरे अंकल चुप जा मेरे माथ पिरा रहा है। क्यो पिरा रहा है गुरु अबे यही सोच-सोच कर कि आने वाली पीढ़ी की टेंसन कैसे दूर होगी यार, हमारी टेंशन तो मां का आंचल में मुंह छिपा कर वैसे ही खत्म हो जाती थी। गुरु तो नई पीढ़ी कोई रास्ता निकाल लेगी।... अबे रास्ते बनाना और निकाला नई पीढ़ी के बस का नहीं, होता तो में यूं परेशान नहीं होता बेटा। हो...हो...सुबुक... सुबुक..स..स..हूं..हूं। गुरु रोने का अंजाद भी बदल लो वर्ना कही के नहीं रहोंगे। गुरु....!!!!

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