अपने अमीर भाई...
वो ही थ्री इडिएट्स फिल्म बनाने वाले अमीर खान,
फिर छह करोड़ की लागत से नई फिल्म बना रहे हैं,
उसका नाम है, पिपली लव, इस निर्माणाधीन फिल्म में एक गाना है...
सखी सैंया तो खूब ही कमात हैं,
महंगाई डायन खाए जात है....
इस गाने के अधिकारों के लिए आजकल बड़ी घमासान मची हुई है। अरे ना तो इसके लेखक और ना ही फिल्म से जुड़े किसी पक्ष की।
घमासान है देश की राजनैतिक पार्टियों के बीच। देश का सम्मानित विपक्ष यानी अपोजीशन इस गाने के अधिकार लेने के लिए बेताब है। सारे जतन कर रहा है। अलबत्ता इस मामले में अमीर खान किसी भी प्रकार के लेन-देन का विरोध करते हुए इस पेशकश को ही खारिज कर चुके हैं।
राजनैतिक लोगों का फिल्मी गानों को चुनाव में भुनाने का फंडा कोई नया नहीं है। 1964 में रोटी कपड़ा और मकान फिल्म का गाना- महंगाई मार गई कई वर्ष तक विपक्षी पार्टियों के लिए चुनाव के वक्त प्रयोग किये जाने वालेे गानों में बससे पसंदिदा था। इसके बाद वर्ष 1974 में अमिताभ बच्च ने जब इलाहाबाद से चुनाव लड़ा तो उस वक्त भी एक गाना कांग्रेस पार्टी ने प्रयोग किया। वो था डॉन फिल्म का गाना- खाइके पान बनारस वाला, इस गाने ने भी इलाहाबाद की गलियों और कूचों में खूब धूम मचाई। इसके बाद फिर अमेठी में राहुल गांधी के द्वारा शुरू किए गए अभियान मिल्क रिवॉल्यूशन के लिए भी एक फिल्मी गाने का सहारा लिया गया। मंथन फिल्म के इस गाने के बोले थे, मेरो गम कथा परे, जिसने रिवॉल्यूशन प्रमोट करने के दौरान काफी धूम मचाई। यह गाना भी ऑपरेशन फ्लड पर बेस्ड था, जिस कारण इसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया। इसके बाद कांग्रेस ने ही 2007 के चुनाव में स्लम डॉग मिलेनेयर फिल्म का गाना जय हो, जय हो को चुना जिसने चुनाव में काफी धूम मचाई। यह गाना चलती ट्रेन में फिल्माया गया था, इस गाने की काट में भाजपा ने भी इसकी पेरोडी की थी, जिसमें जय हो का मखौल उड़ाया था। आज फिर महंगाई के कारण देश में चारों ओर लोग हाहाकार कर रहे हैं, एसे हालात में यूपी और बिहार के चुनावों के मद्देनजर अपोजिशन पर्टियां निर्माणाधीन फिल्म पिपली लव के गाने-
सखी सैंया तो खूब ही कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है.... को अपने पक्ष में भुनाने की फिराक में है, लेकिन अमीर खान विपक्षी दलों की इस मुहीम में किसी तरह का कान लगाते नहीं दीख रहे हैं, उसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, अलबत्ता सबसे बड़ा कारण वे सरकार को बैठे-बैठाए नाराज नहीं करना चाहते। विपक्षी पार्टियां चाहे इस गाने के लिए हाथ-पांव मार रही हो, लेकिन इस चर्चित गाने के पीछे एक सच्चाई और सामने आ रही है कि इस गाने को जिन ११ लोगों ने गाया है उन्हें मात्र ११ सौ रुपये का पारिश्रमिक दिया गया है। यानी प्रत्येक सौ-सौ रुपया, अमीर भाई इस महंगाई कै दौर में ससुर सौ रुपये के नोट से आता क्या है। जहां पूरी फिल्म को बनाने में आपने छह करोड़ रुपया पानी की तरह बहा दिया, वहीं इस गाने को स्वर देकर उसे बुलंदियों में पहुंचाने वालों को एक सौ का नोट....... सोच कर ही दया आती है। उन गरीब गायकों पर नहीं एक करोडपति अमीर खान पर!!!!!! क्यों भइया आप भी इससे सहमत हैं कि नहीं। धत्..त ते..री की क्या बोल दिया। जो बोल दिया तो बोल दिया, कहते हैं ना बंदूक से निकली गोली और जबान से निकली बात वापस नहीं आ सकती है भाई काहे रे ! क्यों कि महंगाई डायन खाए जात है।
1 comment:
very nice one
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