ठलुवागिरी का मतलब क्या है? ठलुवा एक आम आदमी है, जो दिनभर दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करता है और फिर शाम को चिड़िया की तरह अपने घोंसले नुमा घर में कैद हो जाता है। वहां उसे ना राजनीति से कोई लेना होता है ना नेताओं से सरोकार। लेकिन वो सबकुछ समझता है, नेता और नौकरशाहों के साथ मिलकर पूंजीपति समाज में कौनसी गोटी फिटकर उल्लू सीधा कर रहे हैं। वही से वह ठलुवा की तरह सोचने लगता है।
Sunday, 11 July 2010
सकीरा को फूटबाल में फिट करना खेल मैनेजमैंट का ही कमाल है
सांसें रुक गई हैं, वक्त ठहरा सा लग रहा है। मौसम की तल्खी भी नहीं रोक पा रही, फीफा वल्ड कप से अधिक लोगों को बेचैनी है, सकीरा के नृत्य, उसके लटके झटके देखने की। उसकी मस्तानी अदाओं की। हर अदा पर आहें भरने वाले फुडवॉल प्रेमियों से भी अधिक हैं। उनकी बैचेनी फुडवॉल के फाइनल में भिड़ रही टीमों से अधिक सकीरा में है। सकीरा इस लायक भी है। स्टारडम के इस युग में खेल प्रबंधकों ने खेलों का मैनेजमैंट इस कदर रंगत पूर्ण किया कि बस सभी लोग दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाए। अरे-अरे क्या हुआ तुम्हें नहीं है फुटवॉल से प्रेम तो क्या हुआ। सकीरा का नाच ही देख लो। नहीं जानते सकीरा को तो जान जाओगे। खेल प्रबंधन की बानगी देखिए- क्रिकेट में टी-२0 में सबसे पहले प्रयोग हुआ। क्रिकेट में प्रत्येक टीम के लिए चियरगर्लस का प्रयोग करके प्रबंधकों ने क्रिकेट का अति रुचिकर बना दिया कि क्रिकेट जो करोड़ों का खेल था वह अरबों में तब्दील हो गया। चियर गर्लस के लटके झटकों ने रुचि रखने वालों ने धीरे-धीरे ही सही क्रिकेट के रोमांच को अंगीकार किया और क्रिकेट के चाहने वालों की संख्या ही बढ़ी। फुटवॉल में भी सकीरा का प्रयोग काफी सफल प्रतीत हो रहा है। लगता है जल्दी ही फुडवॉल के दिन भी फिरेंगे। फुटवॉल के दिन पश्चिमी देशों में तो फिरे हुए हैं ही। सबसे ज्यादा बुरा हाल भारत में ही है। भारत में भी सकीरा प्रयोग आजमा कर फुटवॉल को नई जान दी जा सकती है। हमारे यहां खेलों के प्रति आम आदमी की रुचि चुने हुए खेलों तक ही सीमित है। अलबत्ता कई खेल हैं जो मैनेजमैंट के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। सरकारी सहायता के बूते घिस-घिस कर चल रहे इन खेलों में नई जान तभी फूंकी जा सकती है जब इन खेलों में भी सकीरा और चियरगर्लस टाइप कोई प्रयोग हों और इन खेलों में भी रोमांच भर दिया जाए। उसी खेल का भला हो सकता है जिस खेल का दर्शक वर्ग व्यापक होगा। बिना दर्शक वर्ग के खेल का विकास और उससे जुड़े हुए लोगों की रोजी-रोटी का हल नहीं निकल सकता। यहीं हाल हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी का भी है। हालत इतनी बदतर है कि जिस हॉकी के लिए भारत को जाना जाता था, वही हॉकी आज दम तोड़ चुकी है। हालत इतनी पतली हो गई है कि हॉकी विश्व कप के लिए हमारा देस क्वालीफाई भी नहीं कर पा रहा। एक अरब की जनसंख्या के बाद भी हम खेलों में इस कदर पिछड़े हुए हैं कि हमें हॉकी जैसे खेल के लिए ११ ध्यानचंद नहीं मिल पा रहे। ध्यानचंदों की इस देस में कमी नहीं है। ११ नहीं ११ हजार भी निकल आएंगे, लेकिन खेल मैनेजमैंट के जरिए हमने पहले खुद को प्रोफेसनल बनाना है तभी पदकों का जखीरा हमें मिल सकेगा। वर्ना जनसंख्या में बससे अधिक होने के बाद भी हम पदकों के लिए तरसते रहेंगे। समतते नहीं हो यार....!!!!!!!!
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