Friday, 16 July 2010

हमारी थाती को बचाने कोई और नहीं आएगा...!

बचा लो ग्लेशियरों और बुग्यालों को वर्ना...! कहानी बन जाएगा हिमालय
मौसम बदल रहा है, इसका असर धीमे जहर की तरह फैल रहा है, लेकिन हम अब भी इससे मुंह फेर हुए हैं, उत्तराखंड के ग्लेशियरों, बुग्यालों से बुरी खबर है। ग्लेशियरों पर बन रहीं झीलें उत्तराखंड के लिए मुसीबत बन सकती हैं, गंगोत्री क्षेत्र के ग्लेशियरों पर कई स्थानों पर झीलें बन रही हैं। यदि खुदा-ना-खास्ता झीलें टूटी तो निचली घाटियों में तबाही को रोका नहीं जा सकता। हाल ही में गंगोत्री ग्लेशियर का सर्वे कर लौटी प्रसिद्ध पर्वतारोही डॉ. हर्षवंती बिष्ट ने वहां से लौटने के बाद उत्तराकाशी में इस बात पर चिंता जताई, उन्होंने कहा कि 'ग्लेशियरों में जो झीलें नजर आ रही हैं, उनकी गहराई का अनुमान लगाना मुश्किल है। दरारों के बाद ग्लेशियरों के चटकने से हिम और भू-स्खलन की हालत बन रही है। इस तरह की घटना से क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन बिगडऩे की भी आशंका है।वहीं वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. अशोक कुमार दुबे ने कहा कि ग्लेशियरों में हिम और भूस्खलन की घटना गंभीर खतरे का संकेत है। सीजन में कम बर्फबारी से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। झीलों के टूटने के बाद के खतरे की सही जानकारी का पता अध्ययन के बाद ही लगाया जा सकता है। ग्लेशियरों के पिघलने के बावत विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के तपोवन, रक्त वन, नंदन वन, खड़ा पत्थर, वासुकीताल, शिव लिंग, भागीरथी, मेरू, सुदर्शन आदि पर्वत शृंखलाओं के बेस कैम्प के ग्लेशियरों पर भी दरारें देखने को मिल रही है। गोमुख क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से बन रहीं झीलें तबाही मचा सकती हैं। क्षेत्र में ग्लेशियरों में तेजी से उभरती जा रहीं दरारों ने भी वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। खतरे की बात यह है कि, क्षेत्र में बन रहीं इन झीलों के टूटने की स्थिति में निचले क्षेत्रों को अलर्ट करने का कोई सिस्टम नहीं है। यदि एेसी कोई अनहोनी होती है तो भागीरथी घाटी में स्थित टिहरी बांध समेत आधा दर्जन से ज्यादा बिजली परियोजनाओं की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। पर्वतारोही डॉ. हर्षवन्ती बिष्ट ने ग्लेशियर में झीलें बनने और ग्लेशियरों में चौड़ी दरारें देखे जाने की पुष्टि की है। इससे पूर्व गंगोत्री क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक छोटे ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं। पिछले पांच छह वर्षों से इन ग्लेशियरों पर उभरी दरारें तेजी से चौड़ी होती जा रही हैं। इन दिनों गोमुख से आगे तपोवन मार्ग से लगे चतुरंगी ग्लेशियर पर कई स्थानों पर लम्बी दरारें तथा कई छोटे-छोटे तालाब दिखाई दे रहे हैं। पिछले तीन वर्षों में इन झीलों के बनने के साथ दरारों के चौड़ी होने के साथ हिमस्खलन और भू-स्खलन की घटनाओं में तेजी आ रही है। हालांकि यह झीलें आकार में बहुत बड़ी नजर नहीं आ रही हैं लेकिन हिम या भूस्खलन की वजह से यह झीलें टूटी तो निचली घाटियों में तबाही का कारण बन सकती हैं। ग्लेशियरों के ऊपर बन रही इन झीलों से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार में भी तेजी आयी है। जिससे नीचे के इलाकों को खतरा भी खतरा है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हिमालय ही कहानी बन जाएगा।
(पत्रकार मित्रों से बातचीत के आधार पर रिपोर्ट)

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