पश्चिमी देशों की समृद्धि के बारे में सोच-सोच कर मुझे भी अपने वेस्ट की समृद्धि पर काफी गर्व होने लगता है। दोनों के बीच अंतर करने की प्रवल इच्छा पैदा हो जाती है। अपना वेस्ट जहां दिल्ली से एक दम सटा हुआ, गंगा और यमुना के दोआब में बसा हुआ है। यहां खेती से लेकर कल कारखाने तक की भरमार के कारण लोगों के चेहरे खिले हुए दिखते हैं। इससे एक बात पूरी तरह सही लगती है कि चाहे कहीं का भी पश्चिम हो समृद्धि लिए ही होता है। एेसा वास्तु शास्त्र में भी माना जाता है। वास्तुशास्त्र भी घर के पश्चिमी इलाके में ही तिजोरी आदि रखने की सलाह देता है। इसी कोण में बताते हैं कि लक्ष्मी का वास होता है। इसी लिए पश्चिम, चाहे वे पश्चिमी देश हों या फिर उत्तर प्रदेश का पश्चिमी इलाका दोनों समृद्धि के मामले में किसी से कम नहीं हैं। वो अलग बात है कि विश्व के पश्चिमी देश उन्मुक्तता के लिए पहचाने जाते हैं तो अपना वेस्ट बेहद दकियानूसी पुरानी और तालिबानी सोच के लिए बदनाम है। यहां प्रेम विवाह करना अपराध है, ऑनर किलिंग और संपत्ति के लिए अपनों का खून बहाना इस क्षेत्र की फितरत बन गई है। इसे प्रेमियों की कत्लगाह भी कहते हैं। इसके अलावा अपने पश्चिम के पास कई एेतिहासिक धरोहरे तो हैं ही साथ ही इन धरोहरों के साथ ही यहां की तमाम तरह की सांस्कृतिक पहचान भी है, लेकिन पश्चिम होने का मतलब यह नहीं कि यहां हर ओर विकास की गंगा ही बह रही है। इस इलाके में इतनी गरीबी भी है कि पूछो मत। विकास के नाम पर लाले भी हैं, गंगा खादर के इलाका हो या फिर यहां के गावों का हाल देश के अन्य गांवों से अलग नहीं है। पूरे देश से यहां के लोगों में फर्क सिर्फ इतना है कि पूरे देश के गांवों में जहां तीस प्रतिशत अमीर और सत्तर फीसदी गरीब रहते हैं, लेकिन अपने वेस्ट में यह आंकड़ा कुछ ठीक-ठाक है। यहां 60 फीसदी के करीब अमीर और 40 फीसदी के करीब गरीब लोग रहते हैं, यहीं अंतर पश्चिम को सबसे अलग करता है।
अगर यहां के गांवों की बात करे तो ऊफ! मुंह से निकल ही आता है। पूरे देश के अन्य गांवों की तरह यहां के गांवों में पहुंचना भी काफी कठिन है। आसपास के कस्बों से गांवों में आने जाने के लिए भी डग्गामार वाहनों की भरमार, उन डग्गामार वाहनों में लदकद कर भरे लोग, किसी तरह सफर करते हैं, यहां गांवों में रहने वाले लोग तीन प्रकार का जीवन यापन करते हैं, एक तो बहुत ही गरीबी का जीवन जीते हैं, उनके पास खेती बाड़ी नहीं है, वे खेत मजदूर हैं, दूसरे हैं जो धनधान्य से परिपूर्ण हैं, लेकिन फिर भी काफी सादा जीवन जीते हैं, तीसरे प्रकार के लोग है जो काफी विलासिता का जीवन जीते हैं, उन्होंने अपने धन को खर्च करने के साथ ही उससे तड़क भड़क दिखाना सीख लिया है। यहां अचानक अमीर बनने के भी कई कारण हैं। एनसीआर से जुड़ा होने के कारण कई किसानों की जमीनें सरकार ने अधिगृहित की हैं, अधिगृहण से करोड़ों रुपया अचानक किसानों के पास पहुंच गया है। जिससे उनके जीवन स्तर में अचानक बदलाव आया है। इस अचानक धन आगमन के कारण यहां किसानों के समाज में कई प्रकार के विकार भी आए हैं। इनसे कई परिवार फिर दाने-दाने को मोहताज हैं, इसका प्रमुख कारण यह है कि किसान को खेती करना ही आता है। उसके पास धन आ गया तो वह अपने धन को किसी अन्य काम में लगा तो देता है लेकिन अनुभव के अभाव में कई लोग धन की बार्बादी भी कर सड़क पर आ गए हैं, इस प्रवृति के कारण ही तमाम किसान, अधिगृहण के साथ ही कुल अधिगृहित भूमि का दस फीसदी कृषि भूमि अन्य स्थान पर देने की मांग कर रहे हैं, यह मांग जायज लग रही है। हम सभी को इस पर विचार करना चाहिए। या फिर जिन किसानों को जमीन अधिगृहित हुई है उन्हें और उनके परिवार के महिला और अन्य युवकों को सरकार की ओर से विशेष प्रशिक्षण भी दिए जाने चाहिए ताकि वे मिले धन का सदुपयोग कर सके और अपना भविष्य सुरक्षित कर सके। क्यों कि एक किसान के पास सबसे बड़ी जमा पूंजी उसकी जमीन होती है। अगर जमीन ही नहीं रही तो वह बाबला हो जाता है, इस बावलेपन में गई एेसे काम हो जाते हैं जिन्हें एक आम किसान ही समझ सकता है। कई बार कई अपराध और अन्य बिकारों के कारण आम किसान तबाह हो जाता है। इसके लिए हमसभी को विचार करना चाहिए। इसके लिए वेस्ट में नए विचारों को फैलाने के लिए प्रयास करने की जरूरत है। चलों इस बावले पन का इलाज करें एक दूसरे का सहारा बने।।
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What a fantastic article
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