जनता जनार्जन का फैसला समझ कर जब नेताजी ने हार स्वीकार कर ली तो फिर समर्थकों को कुछ कहने के लिए नहीं बचा और सभी चुपचाप सिर झुकाएं भीड़तंत्रदेवता के मंत्र का जाप करते हुए चुपचाप चले गए। उनमें से एक मैं भी ठलुआजी के साथ चल रहा था कि अचानक पानी में छपाक से पांव गया तो याद आया कि रास्ते के स्थान पर हम गंदे नाले में उतर आए हैं, तब चुनावी वायदा याद आया ओफ पिछले चुनाव में जनता से नेताजी ने वायदा किया था चुनाव जीत कर इस गंदे नाले पर जनसुविधा के अनुरूप पुल का निर्माण कराएंगे, लेकिन चुनाव जीतने के बाद नेताजी ने फिर वायदे को याद ही नहीं किया और कब पांच वर्ष बीत गए, यह पता ही नहीं चला कि चुनाव कब सिर पर आ गए और जनता ने गंदेनाले पर पुल बनाने समेत तमाम भुलादिए गए वायदों को याद कर नेताजी के परम विरोधी और विपक्षी दल के नेता को वोट दिए कि उनकी जीत लाखों के पार पहुंच गई। इस जीत के पीछे माफियातंत्र का भी उतना ही हाथ था जितना नेताजी के भीड़तंत्रदेवता को भुलाने का था।
नेताजी तो फिर भी मझें हुए व्यक्ति थे उन्हें हार ने उतना नहीं तोड़ा, क्यों कि वे फिर अपने राज्यसभा में जाने की तैयारी करने लगे, उसी रात उन्होंने आलाकामान को तीन खोखे पहुंचवा दिए और नेता जी हारने के एक माह बाद ही विधायक के स्थान पर सीधे सांसद बन गए। लेकिन, उनका समर्थक ठलुवा था अब विरोधियों के निशाने पर, तमाम तरह से सभी ने उसे घेर लिया। रोज उसके घर पर हमला होता, कभी भीड़ उसे सरेबाजार पीट देती तो कोई तेजाब डालने का प्रयास करता, ठलुआ को भूमिगत होने के लिए मजबूर कर दिया। ठलुवा पर हो रहे अत्याचारों पर नेताजी ने अपना मुंह खोलने की जरूरत नहीं समझी, चुनाव के बाद मैं भी काम धंधे निपटाने के लिए बाहर चला गया, जब लौटा तो ठलुवा की याद आई सो उनके घर पर पहुंचा तो देखा कि जो पुलिस कप्तान जो कभी ठलुवा जी की बैठक में बैठने के लिए तरस जाता था, वहीं आज हाथ में सब्बल पकड़ कर ठलुवा जी की घर की चौखट उखाड़ रहा था, मुझे देख कर ठिठका और बोला, महोदय क्या करें नौकरी बजा रहे हैं, ठलुवा जी के घर की कुर्की हो रही है, अब ठलुआजी प्रदेश के प्रमुख ईनामी बदमाश बन गए हैं, मैंने कहा—कप्तान साहब, ठलुआ जी ने कभी चीटीं भी नहीं मारी यह आप भी जानते हैं, लेकिन फिर वे इतने जघन्यअपराध कैसे कर सकते हैं....और क्यों, क्या करें बस नेताजी के कुकर्मों का फल है.... किसी को तो भुगतना ही पड़ेंगा ना। इस बार ठलुवाजी.... । नेताजी तो चुपचाप सांसद बन कर राष्ट्रीय राजधानी में मौज कर रहे हैं, उन्हें तो सुध ही नहीं है कि जिसके कंधे पर बैठकर उन्होंने राजनीति का सफर तय किया उस क्या बीत रही है। खैर देखा एक कौने पर भाभी जी बच्चे को गोद में बैठाए सुबक रही हैं, हमने पूछा कहां है, ठलुवा जी, भाभी जी बोली पिछले तीन माह से उनका पता नहीं, कुछ करो भइया। मैं भाभी जी को उनका कुछ जरूरी समान समेत उनके मायके पहुंचा आया और कहा जब तक हालात ठीक नहीं होते आप चुपचाप यहीं पड़ी रहना। फिर निकल पड़ा ठलुवाजी की तलाश में। ठलुवाजी गंगा किनारे मल्लाहो की बस्ती में अखाड़े में सोये मिल गए। देखते ही मचान से कूद कर नीचे आए बोले-- मुझे पता था तुम्हारे सिवा कोई नहीं जो हमारी खोजखबर लेगा। फिर कहा... कुछ मत बोले अपनी भाभी को छोड़ आए मायके-- मैं चौका, रुक कर... बोले मुझे सब पता है, मेरे कुछ साथी सारी खबर मुझतक पहुंचा रहे हैं। मैंने कहा यह सब लुका-छिपी कब तक बोले अभी खुलकर खेलने का वक्त नहीं आया है। आज रात देखना क्या होने वाला है। मैंने पूछा क्या होगा, बोले देखते रहो कल पता चलेगा... बोले अब यहां मत आना और देखते रहना, जब मुझे तुम्हारी जरूरत होती मैं तुम्हें खुद ही याद कर लूंगा। यह कहकर फिर ठलुवाजी मचान पर चढ़ कर कहीं विलुप्त हो गए और फिर मैं कई सवालों के जवाब खोजता हुआ चुप-चाप अपने दफ्तर की ओर चला गया। रामू से चाय लाने को कहकर में अपनी खबरों में खो गया। काम निपटा कर जा ही रहा था कि एक टेलीफोन घन-घना उठा, पता चला कि ठलुवा जी के घर को किसी ने आग के हलवाले कर दिया है। खबर बड़ी थी, प्रदेश के एक इनामी बदमाश के घर को कुछ लोगों द्वारा जलाना खबर तो थी ही, खबर के लिए लोगों को भेजा और मैं इधर-उधर घटना की टोन लेने लगा। देखते ही देखते कई नेताओं के बयान आने लगे। कल तक खलनायक बने ठलुवाजी के पक्ष में तमान जनसंगठन और कई दलों के नेता आंदोलन के लिए उतरने लगे। 15 दिनों में ही ठलुवाजी खलनायक से नायक की भूमिका में आ गए। इसी बीच अचानक सुबह दस बजे पता लगा कि भारी भीड़ और ढ़ोल नगाड़ों और मालाओं से लदे-कदे सफेद कुर्ता और टोपी पहने ठलुवाजी खुली जीप पर लदे हुए सीधे कोर्ट पहुंच गए और स्वयं को उन्होंने कानून का पुजारी बताते हुए कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया। भीड़ बार-बार ठलुवाजी को निर्दोष बता कर नारेबाजी कर रही थी और पुलिस के खिलाफ नारेबाजी कर रही थी। पिछले छह माह के भीतर वहीं ठलुवाजी जो कि प्रदेश के इनामी बदमाश हो गए थे अचानक ही पूरे प्रदेश में सभी के आंखों का तारे हो गए। मैं सोचन लगा कि अरे भीड़तंत्रदेवता ठलुवाजी पर इतने खुश हो गए हैं कि अचानक ही ठलुवाजी के समर्थन में वो सभी लोग पहुंचने लगे हैं जो कि अभी तक बिलों में छीपे हुए थे। देख की नेताजी भी अपनी लग्जरी कार से सीधे कोर्ट पहुंचे और ठलुवाजी के गले में हार डाल कर उनसे लिपट गए जैसे की भरत मिलाप हो रहा हो, कुंभ के मेले में बिछुड़े हुए भाई मिल गए हो। इधर, पता चला कि ठलुवाजी को तत्काल जमानत दे दी गई और उनके खिलाफ दर्ज सभी मुकदमों की जांच के लिए एक विधायकों की कमेटी बना दी गई। पुलिस पर तमाम मीडिय़ा के लोग दबाव बनाने लगे, पुलिस की छीछालेदर हो गई। कप्तान को तत्काल निलंबित किया गया। पुलिस वाले इधर-से उधर हो गए। ठलुवाजी जी भीड़तंत्रदेवता के गणों के कंधों पर जब कोर्ट से बाहर निकले तो भीड़ ने दो शब्द कहने का अनुरोध किया। ठलुवाजी तीन माह के अज्ञातवास के बाद पूरीतरह निखर गए थे। अब तक लोगों के सामने आने से डरने वाले ठलुवाजी अब पूरी तरह गिरगिट बनकर रंग बदल चुके थे। उन्होंने सभी को धन्यवाद दिया और आंखों में घडिय़ाली आंसू लेकर बोले जो प्यार आपने दिया है उसका कर्ज उतरने के लिए वे आज से ही जनता की सेवा में समर्पित हैं। फिर अपार जनसमुह के बीच ठलुआजी जिसे खोज रहे थे उसे कोई नहीं समझपाया, उसे सिर्फ मैं ही समझा कि वे किसे खोज रहे हैं। फिर मैं कभी ठलुवाजी के पास नहीं गया। क्यों कि वो शहर मेरा छूट गया था। तीन वर्ष बाद पताचला कि ठलुवाजी को देश की एक प्रमुख पार्टी ने टिकट दे दिया है और वे विधानसभा में पहुंचकर एक काबीना मंत्री भी बन गए हैं। ठलुवाजी भी पूरी तरह बदल गए हैं, पता चलाकि उन्होंने अपने परम विरोधी नेता जी की बहन को जीवन संगिनी बना लिया है, उनके निसाने पर अब नेताजी है जिन्होंने कभी उन्हें मझधार में छोड़ दिया था। तमाम वो सब काम करने लगे हैं जो कि एक नेता करते रहते हैं...। भाभी जी का हाल देखकर जब मुझसे नहीं रहा गया तो एक दिन मैं ठलुवाजी से मिलने राजधानी चला गया तो वहां ठलुवाजी ने मुझें पहचानने से ही इनकार कर दिया...फिर मेरे पास कुछ कहने को शब्द ही नहीं बचे। लौटकर भाभी जी को बताया तो उनकी आंखों से गिरते आंसू और ठलुवा के वो दिन सब याद आये.....लेकिन कोई क्या कर सकता है जब कोई नेता बनता है तो फिर उसे बदलना तो पड़ता ही है। समझौता तो करना ही पड़ता है। फिर उससे कैसी नाराजी, जब चुनाव हारजाएंगा नेता तो फिर उसे सब याद आएंगा इसी इंतजार में मैं और भाभी जी अपने-अपने काम में जुटें हुए हैं। ठलुवाजी के चुनाव हारने की प्रतीक्षा में.....। आज पता चला कि ठलुवाजी चुनाव हार गए हैं और उनका पांच वर्ष बाद फिर मेरे लिए टेलीफोन आया, हैलो...हैलो.. कैसे हो भाई, मैं भी अब मझ गया हूं हैलो..ठलुवाजी नमस्कार... ही...ही..ही...बहुत अच्छे.......बहुत अच्छे... बहुत ही अच्छे... अब मेरी बारी थी। नेता बनने की तो कतई नहीं...?
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